Friday, 29 November 2024

स्काउट का जीवन

स्काउट का जीवन

धूप में तपती राहों पे चलना,
आंधी-तूफानों में अडिग रहना।
धरती से लेकर अम्बर तक,
स्काउट का यही  है।कहना।

त्याग और सेवा पथ अपनाना,
सपनों को जग के लिए सजाना।
हर विपदा को गले लगाकर,
समर्पण से जीवन को पाना।

संघर्ष से कुछ घबराना नहीं,
हर कठिनाई  हंस कर सहना।
साहस, सेवा, समर्पण का,
जीवन मंत्र सदा रहना।

दूसरों के आंसू पोंछे,
 दुख में साथी बन जाए।
स्वार्थ से ऊपर उठकर,
अपनी खुशियां  भी वार जाए।

देश-भक्ति, मानव-सेवा,
इन मूल्यों का वह प्रतीक है।
स्काउट तो है समाज का दीपक,
हर दिशा में जो प्रकाशित है।

हर दिन सीखता, बढ़ता जाता,
जीवन को नित नई राह दिखाता।
सच्चाई, त्याग, समर्पण का पथ,
स्काउट का हृदय वही अपनाता।


कलम घिसाई


स्काउट पर मुक्तक

देशभक्ति का जोश दिलों में जगाता है,
त्याग और सेवा का संदेश सुनाता है।
निश्छल हृदय से सदा निष्ठा  को साथ ले,
स्काउट हर बाधा में दीप जलाता है।


साहस की मशाल से पथ को दिखाता है,
जीवन में अनुशासन का पाठ पढ़ाता है।
संकल्प और साधना का  बताता जो मर्म ,
स्काउट सदा सच्चाई का मान बढ़ाता है।


जंगल हो या पर्वत, हर राह अपनाता है,
कठिनाइयों में भी मुस्कान लुटाता है।
सेवा, करुणा, सादगी में जो सिमटा, 
स्काउट हर दिल को प्रेरित करता है।



Saturday, 23 November 2024

अनकही स्याही

कहानी: "अनकही स्याही"

रात के अंधेरे में दीपक की मद्धम रोशनी के सामने बैठा एक व्यक्ति अपनी डायरी के पन्नों पर शब्दों का मेला सजाए बैठा था। यह था विवेक, एक ऐसा साहित्यकार जो शब्दों का जादूगर तो था, पर उसकी जादूगरी का असर किसी पर नहीं होता था। समाज ने उसे अनदेखा कर दिया था, और अब वह खुद को असफल मान चुका था।

विवेक के कमरे में किताबों के ढेर थे। दीवारों पर महान साहित्यकारों के चित्र टंगे थे—मिर्ज़ा गालिब, प्रेमचंद, टैगोर। उनका सान्निध्य ही विवेक का सहारा था। वह कहता, "शब्द मेरी आत्मा हैं। इन्हें छोड़ना मेरे लिए मृत्यु समान है।"
लेकिन इन शब्दों का न कोई प्रकाशनकर्ता था और न कोई पाठक। उसने अपने लेख अनेक जगह भेजे, पर हर बार वही उत्तर आता, "आपकी शैली हमारी पाठक संख्या के अनुरूप नहीं है।"

एक दिन गाँव का अध्यापक, गोविंद, जो विवेक की लेखनी का आदान-प्रदान पढ़ता था, उसके पास आया। उसने कहा, "विवेक भाई, आपकी कहानियों में जो गहराई है, वो मैंने कहीं नहीं देखी। आपने मेरी ज़िंदगी बदली है।"
गोविंद ने सुझाव दिया कि विवेक अपनी रचनाओं को ऑनलाइन साझा करे। विवेक ने झिझकते हुए सोशल मीडिया का सहारा लिया।

धीरे-धीरे, उसकी कविताएँ और कहानियाँ पढ़ने वाले लोग मिलने लगे। लेकिन समस्या यह थी कि उसके लेख पढ़े जाते, परंतु उन्हें लाइक, शेयर और कमेंट नहीं मिलते। वह बार-बार अपना अकाउंट खोलता और खाली नोटिफिकेशन देखकर उदास हो जाता।

"क्या मेरे शब्द इतने कमजोर हैं कि लोग इन्हें पढ़कर भी अनदेखा कर देते हैं?" वह खुद से सवाल करता।

एक रात, जब उसके कई प्रयास विफल हो चुके थे, उसने अपनी डायरी में लिखा:
"मैं असफल हूँ। शायद मेरे शब्द किसी के लिए नहीं हैं। लेकिन फिर भी, मैं लिखना नहीं छोड़ सकता। यह मेरी नियति है।"

विवेक की उम्र बढ़ती गई, और वह दुनिया से और भी अधिक अलग-थलग हो गया। उसकी सेहत बिगड़ने लगी, लेकिन वह लिखना नहीं छोड़ता था। उसके कमरे की मेज पर डायरी का हर पन्ना भरा हुआ था।
एक दिन, जब वह अपनी मेज पर लिखते हुए सो गया, वह कभी नहीं उठा। उसके शब्द वहीं अधूरे रह गए।


उसके शोक सभा में गाँव के कुछ लोग और उसके कुछ पुराने विद्यार्थी आए। उनमें से एक था गोविंद, जिसने कभी विवेक की लेखनी को सराहा था। गोविंद ने उसकी डायरी और पुरानी रचनाएँ अपने पास रख लीं।

गोविंद ने तय किया कि वह विवेक के लेखन को दुनिया तक पहुँचाएगा। उसने विवेक की कहानियों और कविताओं को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया और सोशल मीडिया पर साझा करना शुरू किया। धीरे-धीरे, विवेक की रचनाएँ वायरल होने लगीं। लोग उसकी गहराई को पहचानने लगे।


कुछ महीनों बाद, विवेक की पुस्तक ने साहित्य जगत में अपनी जगह बनाई। उसे मरणोपरांत एक प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। जिस व्यक्ति को उसकी ज़िंदगी में कभी पहचान नहीं मिली, उसे मरने के बाद वही समाज सराहने लगा।


विवेक भले ही इस दुनिया में न था, लेकिन उसके शब्द अब अमर हो चुके थे। गोविंद ने मंच पर विवेक के सम्मान में कहा:
"उनकी स्याही कभी अनकही नहीं थी, बस हम सुनने को तैयार नहीं थे। आज उनकी रचनाएँ हमें सिखा रही हैं कि शब्द अमर होते हैं।"

"स्याही चाहे कितनी ही अनदेखी क्यों न हो, उसका असर समय के साथ ज़रूर दिखता है।"

*कलम घिसाई*

Tuesday, 29 December 2020

तेरी चाहत में

 212 122  222  212


दिल भटक भटक कर बंजारा हो गया। 

(तेरी चाहत में।)

दिल तड़प तडफ़ कर आवारा हो गया।
दिल भटक भटक कर बंजारा हो गया।
 
तुम तो हाथ मेरे आओगी भी  नही ।
सोच कर यही मधु  बेचारा हो गया।

बात मेरि अब यह सुनता भी  है  कहाँ 
 जब से दिल मिरा यह  तुम्हारा हो गया।

मेहमान जब से तुम बनकर आ गई।
रोशनी सा दिल मे उजियारा हो गया।

अब तो बस लगे यह दुनियाँ ही दोगली।
 ख़ाक साजमाना यह सारा हो गया।
*कलम घिसाई*





Saturday, 22 August 2020

गणेश चतुर्थी पर 8 अवतार वर्णन

 


    भगवान श्री गणेश के आठ अवतारों का  संक्षिप्त  वर्णन (गणेश चतुर्थी विशेष)

*******************************

आज चतुर्थी भाद्र मास की , शुक्ल पक्ष की यह बात है।

श्री गणेश का जन्म दिवस है,जो रिद्धि सिद्दी अहिवात है।

मात पार्वती ने  गणेश को ,तनिक मैल से गात दिया।

और जन्मते ही रखवाली का ,अभिन्न काम अंजाम दिया।

पहरा देते समय वहां पर ,महादेव जब आ ही गये।

आप कौन और किधर से आये, लगते हो मुझे नए नये।

मेरे घर मे मुझको टोके, अचरज खा गए त्रिपुरारी।

बोले हट  छोड़ मार्ग तू ,कौन है तू जो करे रखवारी।

बात बढ़ी ओर महादेव ने ,हल्का एक प्रहार किया।

बालक का जो सर था उसको,धड़ से शीघ्र उतार दिया।

पार्वती को पता चला तो,आग बबूला हो बैठी।

महादेव से मूँह को मोड़ा, और फिरे ऐंठी ऐंठी।

चला पता जब देवलोक में ,दौड़े दौड़े सब आये।

जैसे तैसे ऐसे वेसे ,सब करे जतन और समझाये। 

आखिर मैं यही

हुआ तय फिर , लाल मेरा फिर ज़िंदा हो।

सबसे ज्यादा हो ताकत भी,पूजित सबसे आइंदा हो।

सुनकर महादेव ने श्री विष्णु को,काम यह  तत्काल दिया।

जाकर लाओ कोई भी सिर, विष्णु ने फौरन मान लिया।

सबसे पहले मिला विष्णु को , एक गजबालक नन्हा सा।

उसी से मांगकर ले आये , विष्णु वो सिर  नन्हा सा।

किया व्यवस्तिथ गज के सिर को,और प्राण संचार किये।

इस प्रकार ही श्री गणेश ,गजवदन अवतार हुए।

प्रथम देव का प्रथम रूप ,फिर नाम गजानन कहलाया।

हुए अष्ठ अवतार जो उनके ,प्रथम इसे ही पुजवाया।

           1★गजानन★


श्रीगणेश का यह रूप सांख्यब्रह्म का धारक है। 

सिर पर गज का आनन है उनका वाहन मूषक है।

कहते है शुक्र शिष्य लोमासुर ने  ,वरदान गज़ब का चाहा था।

निर्भय होकर सब लोक में घुमू, यह  शंकर से पाया था।

मिला उसे तथास्तु तो ,आगे उसकी चढ़ आई।

करो रिक्त कैलाश को शंकर, इतनी हिम्मत बड़ आई।

तब श्री गणेश ने उसको, मृत्युमुख में पहुंचाया था।

कहते है इस कारण ही , यह गज का आनन पाया था।


     2 *★विघ्ग्रराज★  *

चलो बताऊं अब गणेश के, कौन कौन अवतार हुए।

विष्णु ब्रह्म के वाचक*विघ्ग्रराज* ,

शेषवाहन पर सवार हुए।

जब ममतासुर ने कर प्रसन्न ,इनसे ही वरदान लिया।

ले आसरा इसी बात का,सकल ब्रम्हांड परेशान किया।

करी देवताओं ने विनती ,फिर विघ्गरराज से जाकर।

ममतासुर को मार गिराया ,इनने गुस्से में आकर।


       3★धूम्रवर्ण★


अजेय अमर अहंतासुर से सम्पूर्ण लोक में हाहाकार मचा।

श्री गणेश ने धूम्रवर्ण बन ,तब शिवब्रह्म का स्वरूप रचा।

नारद ने समझाया बहुविधि पर अहंतासुर

था अभिमानी।

अपने अहम वरदान के कारण ,उसने बात नही मानी।

तब श्री गणेश ने उससे मिलकर भीषण सा संग्राम किया।

ज्ञान हुआ फिर अभिमानी को ,शरणागत हो प्रणाम किया।


         4★ विकट स्वरूप*


श्री गणेश का विकट स्वरूप सौरब्रह्म का धारक है।

जिसमें  वाहन इनका मयूर ,और कामासुर का तारक है।

कामासुर ने  कीन्ह तपस्या ,अजय अमर वरदान लिया।

इसी बात के चलते चलते ,पूरा त्रिलोक परेशान किया।

तब गणेश से देवलोक ने ,अनुनय और गुहार करी।

श्री गणेश ने विघ्नहरण को ,उनकी आर्त पुकार सुनी।

करी चढ़ाई कामासुर पर , जबरदस्त हुँकार किया।

इसे देख कर कामासुर ने ,जमकर गदा प्रहार किया।

मगर गणेश ने पटक गदा को ,पृथ्वी लोक पर डार दिया।

मर तो सकता नही दुष्ट था,सो उसको लाचार किया।

शरणागत हो कामासुर ने ,श्री गणेश का ध्यान किया।

*विकट रूप* श्री गणपति का यह,सारे जग ने मान दिया।


         5★ लम्बोदर★


लम्बोदर अवतार प्रभु का,शक्ति ब्रह्म का धारक है।

यह सत्स्वरूप है मूषकपति का,क्रोधासुर उद्धारक है।

क्रोधासुर ने सूर्यदेव को ,भक्ति से खुश कर डाला।

अजर अमर का वर लेकर ,ब्रह्मांड तंग फिर कर डाला।

लम्बोदर ने क्रोधासुर से ,फिर भीषण संग्राम किया।

कर शरणागत इसको भी ,रहने को अपना धाम दिया।


        6★महोदर ★

ज्ञान ब्रह्म का यह स्वरूप भी, मोहासुर के कारण है।

जिसका सूरज की भक्ति से , अजर अमरतव का धारण है।

सकल लोक को त्रस्त किया जब श्री विष्णु ने समझाया।

नाम सुना जब ★महोदर★ का तो ,मोहासुर भी थर्राया।

गया शरण फिर मोहासुर , मूषक वाहन धारी के।

नाम महा उदर भी जुड़ गया, श्री गणेश जगतारी के।

          7★एकदन्त★

श्री गणेश का यह स्वरूप ,देहि ब्रह्म का धारक है।

च्यवन सुत और शुक्र शिष्य, मदासुर  का मद मारक है।

जिसने माँ भगवती के वर से , त्रिपुरारी शिव को हरा दिया।

अपने छल बल दल से जिसने,सकल लोक को डरा दिया।

बंधा देखकर शम्भू पिता को,शम्भू सुत ने संज्ञान लिया।

मन्द बुध्दि मय मदासुर को , अपना पूरा ज्ञान दिया।

छोड़ शम्भु को  जी जीवन को ,भरपूर उसे समझाया।

पर मद में आकर उसने प्रभु पर, अपना धनु धरना चाहा।

पर बाण चढ़ाना मुश्किल था,श्री गणेश की माया से।

आखिर में हो परेशान वो ,हार गया शिव जाया से।

अभय वाला वर देकर फिर, पाताल लोक में पहुंचाया।

देहि स्वरूप के कारण प्रभु का,नाम एकदन्त कहलाया।

         8★*वक्रतुण्ड*★


वक्रतुंड अवतार प्रभु का,ब्रह्म रूप का धारक है।

ब्रह्मरूप से सकल शरीरों में ,आने जाने में व्यापक है।

वक्रतुंड ने वाहन देखो,मूषक नही शेर  लिया।

मत्सरासुर को इसमें गणेश ने ,घायल करके ढेर किया।

मर तो सकता नही कभी था,अजर अमर का वर जो था।

शिव शंकर को पाशब्द्द कर ,बना दैत्य राज मत्ससुर था।

इंद्र प्रमाद की पैदाइश थी ,इस मतसासुर दानव की।

त्राय त्राय जिससे कर बैठी ,देवलोक संग धरा मानव की।

तब श्री गणेश के दो ही गणो ने ,अहम असुर का चूर किया।

पाताल लोक में भेज दैत्य को ,सकल ब्रह्म से दूर किया।


क्रम तो बतला नहीं पाऊंगा ,इस पर बहुत विचार किया।

परन्तु यह आठ रूप है जिनका मैंने विस्तार किया।


धूम्रवर्ण  ,विघ्ग्रराज  ,विकट,लम्बोदर  ,

गजानन,महोदर,एकदन्त ,वक्रतुण्ड


 


        *कलम घिसाई*









Saturday, 7 March 2020

तू परिंदा है ...

तू परिंदा है मर्ज़ी जहां तक तू उड़।
तेरी मर्ज़ी पड़े उसजहाँ तक तू उड़।
**************************
तुझको उड़ने से कोई नही रोकता।
तेरा कमजोर मन ही तुझे टोकता।
होंसला अपने अंदर जगा तो सही,
पंख तेरे है उनको फैला के तू उड़।
तू परिंदा है .............।
***************************
भूल करना नही सोचने में तू यह।
देगा कोई सहारा फिर उड़ेगा  तू यह।
छोड़ दे नीड पल दो ही पल के लिये।
एक डाली से उड़ कर दूसरी तक तू उड़।
तू परिंदा है .........।
**************************
याद रखना मिलेगा शज़र भी नहीं।
बैठ जिस पर तु जाए जगह भी नही।
जितनी दम है भरोसा तू उस पर ही कर।
बिन सहारा लिये दूर ही तक तू उड़।
तू परिंदा है मर्ज़ी जहाँ तक तू उड़।
***************************

कौन उड़ने का हूनर सिखाये तुझे।
पंख कुदरत ने खुद ही दिए है तुझे।
सीख खुद की उड़ाने सहारे बिना,
अपने दम दूर की हद ही तक तू उड़।
तू परिंदा है मर्ज़ी जहां तक तू उड़।

**************************
चार दिन चौन्च भर दाना देगी तुझे।
बाद माँ भी बिगाना करेगी तुझे।
पेट भरना अगर है ज़रूरी तेरा।
मेहनत करने की जद वहाँ तक तू उड़।
तू परिंदा ............।
***************************
देख डरना नही तू जो भूखा रहे।
काम करना हो जो मर्ज़ी दुनियाँ कहे।
एक दिन कामयाबी मिलेगी तुझे,
राम दिल मे बसा बस यहां तक तू उड़।
तू परिंदा है............।

**कलम घिसाई*










Friday, 28 February 2020

दुर्मिळ सवैया



 *दुर्मिल सवैया*


विधान

दुर्मिल सवैया छंद 24 वर्णों में आठ सगणों (।।ऽ) से सुसज्जित होता है। जिसमें 12, 12 वर्णों पर यति का प्रयोग किया जाता है। अन्त सम तुकान्त ललितान्त्यानुप्रास कहा जाता है। इस छन्द को तोटक वृत्त का दुगुना भी कहा जाता है।
********************************
 *उदाहरण*
*******************************
बदला बदला अब मौसम है,बदलाव हवा  सब ठौरन की।
गलती अब दाल लगे मुझको ,चमचों चमची ठग बन्धन की।
डर पैठ गयो सब सज्जन में ,अब मौज भई सब दुर्जन की।
अब दादुर बोल लगे वजनी ,कम धाक लगे सब शेरन की।

*कलम घिसाई*

Friday, 14 February 2020

मुक्तक अध्यात्म

कृष्ण पिंड से निकली दुनियाँ,कृष्ण पिंड में जाएगी।
कृष्ण तत्व को बिन समझे ,बात समझ नहीं आएगी।
प्रेम ,घृणा सब पागलपन है ,घुप्प अंधेरे के जैसा,
रूह अनन्त है अनन्त रहेगी,भला कहीं रम पाएगी।

          *कलम घिसाई*
(  किसी के समझ आये तो टिपण्णी अवश्य करें साझा करें)